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सांझ!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिन्दी व्यंग्यकार एवं कवि स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| त्यागी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की यह कविता – धीरे-धीरे सांझ हो गईअब बेला के फूल हिल गएनभ में जमा…
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रुस्वाइयों से दूर नहीं!
रुस्वाइयों से दूर नहीं बे-क़रारियाँ, दिल को हो काश सब्र का यारा कभी कभी| असर लखनवी