Category: Uncategorized
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मुझे डर लगता है!
एक मुद्दत से मिरी माँ नहीं सोई ‘ताबिश’ मैं ने इक बार कहा था मुझे डर लगता है | अब्बास ताबिश
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मंज़िलें पाँव पकड़ती!
मंज़िलें पाँव पकड़ती हैं ठहरने के लिए शौक़ कहता है कि दो चार क़दम और सही साहिर लखनवी
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कहते हैं यूँ है यूँ है!
उस का अपना ही करिश्मा है फ़ुसूँ है यूँ है,यूँ तो कहने को सभी कहते हैं यूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़
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मेरी कुछ और रचनाएं-8
एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनको भी ढोल पीट लेता हूँ, क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और…
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आज का ग़म न कर!
मिरी जान आज का ग़म न कर कि न जाने कातिब-ए-वक़्त ने,किसी अपने कल में भी भूल कर कहीं लिख रखी हों मसर्रतें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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सनम की मुरव्वतें!
जो तुम्हारी मान लें नासेहा तो रहेगा दामन-ए-दिल में क्या,न किसी अदू की अदावतें न किसी सनम की मुरव्वतें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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वरक़ तिरी याद के!
ये सुख़न जो हम ने रक़म किए ये हैं सब वरक़ तिरी याद के,कोई लम्हा सुब्ह-ए-विसाल का कोई शाम-ए-हिज्र की मुद्दतें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़