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दूरियाँ कभी क़ुर्बतें!
सभी कुछ है तेरा दिया हुआ सभी राहतें सभी कुल्फ़तें,कभी सोहबतें कभी फ़ुर्क़तें कभी दूरियाँ कभी क़ुर्बतें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बुतों ने की हैं जहाँ में!
हम ऐसे सादा-दिलों की नियाज़-मंदी से,बुतों ने की हैं जहाँ में ख़ुदाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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अगरचे रह में हुईं!
पहुँच के दर पे तिरे कितने मो’तबर ठहरे,अगरचे रह में हुईं जग-हँसाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बहम हुए तो पड़ी हैं!
जुदा थे हम तो मयस्सर थीं क़ुर्बतें कितनी,बहम हुए तो पड़ी हैं जुदाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तुम आश्ना थे तो !
न अब रक़ीब न नासेह न ग़म-गुसार कोई,तुम आश्ना थे तो थीं आश्नाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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उस में होगी ख़ामी भी!
ऐसा तो मुमकिन ही नहीं है चाँद में कोई दाग़ न हो,जिस में होगी कुछ भी ख़ूबी उस में होगी ख़ामी भी| क़ैसर शमीम
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अंदर से है खिंचाव!
मेरे अहद के इंसानों को पढ़ लेना कोई खेल नहीं, ऊपर से है मेल-मोहब्बत, अंदर से है खिंचाव बहुत| क़ैसर शमीम
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छुपे हुए उलझाव!
अपने-आप में उलझी हुई इक दुनिया है हर शख़्स यहाँ,सुलझे हुए ज़ेहनों में भी हैं छुपे हुए उलझाव बहुत| क़ैसर शमीम
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जिसमें नहीं घुमाव!
सोच का है ये फेर कि यारो पेच-ओ-ख़म की दुनिया में,ढूँड रहे हो ऐसा रस्ता जिस में नहीं घुमाव बहुत| क़ैसर शमीम