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इक़रार मसीहाई का!
एक बार और मसीहा-ए-दिल-ए-दिल-ज़दगाँ, कोई वा‘दा कोई इक़रार मसीहाई का| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तिरी रानाई का!
सेहन-ए-गुलशन में कभी ऐ शह-ए-शमशाद-क़दाँ, फिर नज़र आए सलीक़ा तिरी रानाई का| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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अंजुमन-ए-गुल-बदनाँ
गर्मी-ए-रश्क से हर अंजुमन-ए-गुल-बदनाँ, तज़्किरा छेड़े तिरी पैरहन-आराई का| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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हर्फ़ शनासाई का!
दौलत-ए-लब से फिर ऐ ख़ुसरव-ए-शीरीं-दहनाँ, आज अर्ज़ां हो कोई हर्फ़ शनासाई का| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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शब-ए-तन्हाई का!
चाँद निकले किसी जानिब तिरी ज़ेबाई* का, रंग बदले किसी सूरत शब-ए-तन्हाई का| *Beauty फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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लिख रखी हों मसर्रतें!
मिरी जान आज का ग़म न कर कि न जाने कातिब-ए-वक़्त ने, किसी अपने कल में भी भूल कर कहीं लिख रखी हों मसर्रतें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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सनम की मुरव्वतें!
जो तुम्हारी मान लें नासेहा* तो रहेगा दामन-ए-दिल में क्या, न किसी अदू की अदावतें न किसी सनम की मुरव्वतें| *Priest, Guide फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बुलावा!
आज एक बार फिर मैं अपने समय के प्रसिद्ध गीतकार स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| अवस्थी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत – प्यार से मुझको बुलाओगे जहाँएक क्या सौ बार आऊँगा वहाँ पूछने…
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शाम-ए-हिज्र की मुद्दतें
ये सुख़न जो हम ने रक़म किए ये हैं सब वरक़ तिरी याद के, कोई लम्हा सुब्ह-ए-विसाल का कोई शाम-ए-हिज्र की मुद्दतें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दूरियाँ कभी क़ुर्बतें!
सभी कुछ है तेरा दिया हुआ सभी राहतें सभी कुल्फ़तें, कभी सोहबतें कभी फ़ुर्क़तें कभी दूरियाँ कभी क़ुर्बतें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़