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हमें लोगों का डर नहीं!
आ जाएँ रोब-ए-ग़ैर में हम वो बशर नहीं, कुछ आप की तरह हमें लोगों का डर नहीं| हैरत इलाहाबादी
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सामान सौ बरस का है!
आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं, सामान सौ बरस का है पल की ख़बर नहीं| हैरत इलाहाबादी
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कुछ ज़हर भी होता है!
दादा बड़े भोले थे सब से यही कहते थे, कुछ ज़हर भी होता है अंग्रेज़ी दवाओं में| बशीर बद्र
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तारीक ख़लाओं में!
हम चाँद सितारों की राहों के मुसाफ़िर हैं, हम रात चमकते हैं तारीक ख़लाओं में| बशीर बद्र
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पंचवटी पृष्ठ 1
आज मैं हिन्दी साहित्य के एक प्रमुख कवि स्वर्गीय मैथिलीशरण गुप्त जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| यह उनके एक प्रमुख काव्य ‘पंचवटी’ का प्रथम पृष्ठ है| गुप्त जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मैथिलीशरण गुप्त जी की यह कविता – पूज्य पिता के…
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फूलों की ख़ताओं में!
मौसम का इशारा है ख़ुश रहने दो बच्चों को, मासूम मोहब्बत है फूलों की ख़ताओं में| बशीर बद्र
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ख़ुशबू सी अदाओं में!
इस शहर में इक लड़की बिल्कुल है ग़ज़ल जैसी, बिजली सी घटाओं में ख़ुशबू सी अदाओं में| बशीर बद्र
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सावन की घटाओं में!
तुम छत पे नहीं आए मैं घर से नहीं निकला, ये चाँद बहुत भटका सावन की घटाओं में| बशीर बद्र
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ख़ुशबू की तरह आया!
ख़ुशबू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में, माँगा था जिसे हम ने दिन रात दुआओं में| बशीर बद्र