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आदमी होने की पहचान!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की लगभग सभी विधाओं में अपना उल्लेखनीय योगदान करने वाले श्रेष्ठ कवि श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता – मैं लिखता…
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नाज़ की बातें करो!
हर रग-ए-दिल वज्द में आती रहे दुखती रहे, यूँही उस के जा-ओ-बेजा नाज़ की बातें करो| फ़िराक़ गोरखपुरी
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सुब्ह होने तक इसी!
निकहत-ए-ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ दास्तान-ए-शाम-ए-ग़म,सुब्ह होने तक इसी अंदाज़ की बातें करो| फ़िराक़ गोरखपुरी
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ये सुकूत-ए-नाज़ ये!
ये सुकूत-ए-नाज़ ये दिल की रगों का टूटना,ख़ामुशी में कुछ शिकस्त-ए-साज़ की बातें करो| फ़िराक़ गोरखपुरी
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बे-ख़ुदी बढ़ती चली है!
शाम-ए-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करो,बे-ख़ुदी बढ़ती चली है राज़ की बातें करो| फ़िराक़ गोरखपुरी
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फ़ासला यूँ कितना है!
एक ही मिट्टी से हम दोनों बने हैं लेकिन,तुझ में और मुझ में मगर फ़ासला यूँ कितना है| शहरयार
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वो जो प्यासे थे !
वो जो प्यासे थे समुंदर से भी प्यासे लौटे,उन से पूछो कि सराबों* में फ़ुसूँ कितना है| *मृगतृष्णा शहरयार
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वो ये क्या जानें !
जम्अ करते रहे जो अपने को ज़र्रा ज़र्रा,वो ये क्या जानें बिखरने में सुकूँ कितना है| शहरयार
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अनल किरीट/ हुंकार!
आज एक बार फिर मैं हमारे राष्ट्रकवि के रूप में ख्याति प्राप्त करने वाले, प्रेम और ओज दोनों प्रकार के काव्य में प्रमुखता से सम्मान प्राप्त स्वर्गीय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की एक ओजपूर्ण कविता शेयर कर रहा हूँ| दिनकर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय…