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हौसला तो रहा!
तमाम उम्र अज़ाबों का सिलसिला तो रहा, ये कम नहीं हमें जीने का हौसला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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वगर्ना ज़िंदगी ने तो!
ये शुक्र है कि मिरे पास तेरा ग़म तो रहा, वगर्ना ज़िंदगी ने तो रुला दिया होता| गुलज़ार
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मुझे सलीब पे दो पल!
ये दर्द जिस्म के या-रब बहुत शदीद लगे, मुझे सलीब पे दो पल सुला दिया होता| गुलज़ार
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मैंने बुझा दिया होता!
न रौशनी कोई आती मिरे तआ‘क़ुब* में, जो अपने-आप को मैं ने बुझा दिया होता| *पीछा करते हुए गुलज़ार
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फूल झरे!
आज मैं प्रसिद्ध हिन्दी नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| श्री मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – फूल झरे जोगिन के द्वारहरी-हरी अँजुरी मेंभर-भर के प्रीत नईरात करे चाँद की गुहार…
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दिल को पिघलाएँ तो!
चंद उम्मीदें निचोड़ी थीं तो आहें टपकीं, दिल को पिघलाएँ तो हो सकता है साँसें निकलें| गुलज़ार
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मिरी शाख़ें निकलें!
दफ़्न हो जाएँ कि ज़रख़ेज़ ज़मीं लगती है, कल इसी मिट्टी से शायद मिरी शाख़ें निकलें| गुलज़ार
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वक़्त की ज़र्ब से!
वक़्त की ज़र्ब* से कट जाते हैं सब के सीने, चाँद का छलका उतर जाए तो क़ाशें निकलें| *चोट गुलज़ार
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लब से दुआएँ निकलें!
ज़िक्र आए तो मिरे लब से दुआएँ निकलें, शम्अ‘ जलती है तो लाज़िम है शुआएँ निकलें| गुलज़ार