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लब से दुआएँ निकलें!
ज़िक्र आए तो मिरे लब से दुआएँ निकलें, शम्अ‘ जलती है तो लाज़िम है शुआएँ निकलें| गुलज़ार
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ख़ूबी भी है ख़ामी भी!
थोड़ी सी शोहरत भी मिली है थोड़ी सी बदनामी भी, मेरी सीरत में ऐ ‘क़ैसर’ ख़ूबी भी है ख़ामी भी| क़ैसर शमीम
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यूँ ही कुछ मुस्काकर तुमने!
आज मैं प्रसिद्ध हिन्दी कवि स्वर्गीय त्रिलोचन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| त्रिलोचन जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय त्रिलोचन जी की यह कविता – यूँ ही कुछ मुस्काकर तुमनेपरिचय की वो गाँठ लगा दी ! था पथ पर मैं भूला-भूलाफूल उपेक्षित कोई फूलाजाने कौन…
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कोई खेल नहीं!
मेरे अहद के इंसानों को पढ़ लेना कोई खेल नहीं, ऊपर से है मेल-मोहब्बत, अंदर से है खिंचाव बहुत| क़ैसर शमीम
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छुपे हुए उलझाव बहुत
अपने-आप में उलझी हुई इक दुनिया है हर शख़्स यहाँ, सुलझे हुए ज़ेहनों में भी हैं छुपे हुए उलझाव बहुत| क़ैसर शमीम
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नहीं घुमाव बहुत!
सोच का है ये फेर कि यारो पेच-ओ-ख़म की दुनिया में, ढूँढ रहे हो ऐसा रस्ता जिस में नहीं घुमाव बहुत| क़ैसर शमीम
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आज दबाव बहुत!
बहके बहके से बादल हैं क्या जाने ये जाएँ किधर, बदली हुई हवाओं का है उन पर आज दबाव बहुत| क़ैसर शमीम
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टकराव बहुत!
होने लगे हैं रस्ते रस्ते, आपस के टकराव बहुत, एक साथ के चलने वालों में भी है अलगाव बहुत| क़ैसर शमीम
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चढ़ गया दिल पर इशारों का नशा!
आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध हिन्दी गीत एवं ग़ज़ल लेखक स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| गर्ग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी का यह गीत – उनके कहने से गुनहगार हुए बैठे हैं,उनकी ख़ातिर ही…
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हर एक सुनता था!
वो चीख़ उभरी बड़ी देर गूँजी डूब गई, हर एक सुनता था लेकिन कोई हिला भी नहीं| जावेद अख़्तर