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रंग और नस्ल ज़ात!
रंग और नस्ल ज़ात और मज़हब जो भी है आदमी से कमतर है, इस हक़ीक़त को तुम भी मेरी तरह मान जाओ तो कोई बात बने| साहिर लुधियानवी
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छीन पाओ तो कोई!
ज़िंदगी भीक में नहीं मिलती ज़िंदगी बढ़ के छीनी जाती है, अपना हक़ संग-दिल ज़माने से छीन पाओ तो कोई बात बने| साहिर लुधियानवी
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सर उठाओ तो कोई!
पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से मुस्कुराओ तो कोई बात बने, सर झुकाने से कुछ नहीं होता सर उठाओ तो कोई बात बने| साहिर लुधियानवी
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मटमैले मेजपोश!
आज एक बार मैंहिन्दी श्रेष्ठ नवगीतकार और मेरे लिए गुरुतुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत- जीने का एक दिनमरने के चार।हमने लिए हैं उधार। मटमैले मेज़पोशलँगड़े…
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अब तो चेहरे को ही
कौन पढ़ता है यहाँ खोल के अब दिल की किताब, अब तो चेहरे को ही अख़बार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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ये तमाशा तो कई बार
एक ही बार में उक्ता से गए हो जिस से, ये तमाशा तो कई बार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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ख़ुद को रुस्वा!
ख़्वाबों और ख़्वाहिशों की बातों में आ कर कब तक, ख़ुद को रुस्वा सर-ए-बाज़ार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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मसअला ये है कि!
मसअला ये नहीं कि इश्क़ हुआ है हम को, मसअला ये है कि इज़हार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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इक मुख़ालिफ़ को!
देखनी है कभी आईने में अपनी सूरत, इक मुख़ालिफ़ को तरफ़-दार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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बुत बस अपना ही!
तोड़ के रख दिए बाक़ी तो अना ने सारे, बुत बस इक अपना ही मिस्मार किया जाना है| राजेश रेड्डी