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बुत बस अपना ही!
तोड़ के रख दिए बाक़ी तो अना ने सारे, बुत बस इक अपना ही मिस्मार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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धानों का गीत!
आज एक बार मैं हिन्दी श्रेष्ठ कवि और नवगीतकार स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी का यह नवगीत- धान उगेंगे कि प्रान उगेंगे उगेंगे हमारे खेत में, आना जी, बादल ज़रूर !चन्दा को बाँधेंगे कच्ची कलगियों सूरज…
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इक ज़रा ज़ेहन को!
दिल तो दुनिया से निकलने पे है आमादा मगर, इक ज़रा ज़ेहन को तय्यार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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बीमार किया जाना है!
हम तसव्वुर में बना बैठे हैं इक चारा-गर, ख़ुद को जिस के लिए बीमार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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दीदार किया जाना है!
शौक़ की हद को अभी पार किया जाना है, आइने में तिरा दीदार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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कोई अजनबी तो नहीं
तुम्हारी बज़्म में अफ़्साना कहते डरता हूँ, ये सोचता हूँ यहाँ कोई अजनबी तो नहीं| कृष्ण बिहारी नूर
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ये ज़िंदगी तो नहीं!
ये हिज्र-ए-यार ये पाबंदियाँ इबादत की, किसी ख़ता की सज़ा है ये ज़िंदगी तो नहीं| कृष्ण बिहारी नूर
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कहाँ ग़म-ए-जानाँ!
ग़म-ए-हबीब कहाँ और कहाँ ग़म-ए-जानाँ, मुसाहिबत है यक़ीनन बराबरी तो नहीं| कृष्ण बिहारी नूर
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ये आशियानों के जलने
हुई जो जश्न-ए-बहाराँ के नाम से मंसूब, ये आशियानों के जलने की रौशनी तो नहीं| कृष्ण बिहारी नूर