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कहीं ज़ुल्मतों में!
कहीं ज़ुल्मतों में घिर कर है तलाश-ए-दश्त-ए-रहबर, कहीं जगमगा उठी हैं मिरे नक़्श-ए-पा से राहें| मजरूह सुल्तानपुरी
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अहंकार और विनयशीलता!
कल मैंने ज्ञानमार्ग और प्रेम मार्ग के बहाने कुछ लिखा था| आज मुझे राजनैतिक परिदृश्य से उसका एक उदाहरण याद आ रहा है, यद्यपि राजनीति के मामले में सबकी राय अलग रहती है और कुछ लोगों की बहुत कठोर धारणाएं होती हैं कुछ नेताओं के बारे में, लेकिन फिर भी जो बात मेरे मन में…
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ग़म-ए-ज़िंदगी निबाहें!
ये रुके रुके से आँसू ये दबी दबी सी आहें, यूँही कब तलक ख़ुदाया ग़म-ए-ज़िंदगी निबाहें| मजरूह सुल्तानपुरी
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तूने शिकवा कर दिया!
वो घर आए थे ‘नज़ीर’ ऐसे में कुछ कहना न था, शुक्र का मौक़ा था प्यारे तू ने शिकवा कर दिया| नज़ीर बनारसी
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देखिए काली घटा ने!
मोहतरम पी लीजिए मौसम ने मौक़ा दे दिया, देखिए काली घटा ने उठ के पर्दा कर दिया| नज़ीर बनारसी
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इश्क़ ने जब बे-नियाज़
आप समझाने भी आए क़िबला-ओ-काबा तो कब, इश्क़ ने जब बे-नियाज़-ए-दीन-ओ-दुनिया कर दिया| नज़ीर बनारसी
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ज्ञान मार्ग और प्रेम मार्ग!
दुनिया में बहुत किस्म के लोग हैं, सबकी अपनी-अपनी विशेषताएं और कमियाँ हो सकती हैं, जिनके आधार पर विद्वान लोग उनको वर्गीकृत कर सकते हैं| मैं विद्वान नहीं हूँ, विद्वान कहलाना मेरा लक्ष्य भी नहीं है, अतः मैं ऐसा कोई प्रयास नहीं करूंगा| मुझे एक प्रसंग याद आता है, गोस्वामी तुलसीदास जी से जुड़ा हुआ,…