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इच्छा शक्ति!
आज एक बार मैं प्रसिद्ध हिन्दी व्यंग्य कवि और श्रेष्ठ मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| चक्रधर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता- ओ ठोकर !तू सोच रहीमैं बैठ जाऊंगीरोकर,भ्रम है तेराचल दूंगी मैंफ़ौरनतत्पर…
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रुस्वा हो सा जाता हूँ!
तुझे बाँहों में भर लेने की ख़्वाहिश यूँ उभरती है, कि मैं अपनी नज़र में आप रुस्वा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर
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मैं प्यासा और प्यासा!
तिरे गुल-रंग होंटों से दहकती ज़िंदगी पी कर, मैं प्यासा और प्यासा और प्यासा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर
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तुम मुस्कुराती हो तो!
मैं चाहे सच ही बोलूँ हर तरह से अपने बारे में, मगर तुम मुस्कुराती हो तो झूटा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर
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तन्हा हो सा जाता हूँ!
मैं तुम से दूर रहता हूँ तो मेरे साथ रहती हो, तुम्हारे पास आता हूँ तो तन्हा हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर
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स्रोत- गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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मगर वो लम्हा जब मैं!
मुझे मालूम है मैं सारी दुनिया की अमानत हूँ, मगर वो लम्हा जब मैं सिर्फ़ अपना हो सा जाता हूँ| जाँ निसार अख़्तर
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झुकी झुकी कुलाहें!
मिरे अहद में नहीं है ये निशान-ए-सरबुलंदी, ये रंगे हुए अमामे* ये झुकी झुकी कुलाहें| *पगड़ी मजरूह सुल्तानपुरी
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तिरी आरज़ू ने हँसकर!
कभी जादा-ए-तलब से जो फिरा हूँ दिल-शिकस्ता, तिरी आरज़ू ने हँस कर वहीं डाल दी हैं बाँहें| मजरूह सुल्तानपुरी