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वक़्त नहीं है बातों का!
ये वक़्त नहीं है बातों का पलकों के साए काम में ला, इल्हाम कोई इल्हाम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है| क़तील शिफ़ाई
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देख चुका हूँ पहले भी!
गो देख चुका हूँ पहले भी नज़्ज़ारा दरिया-नोशी का, एक और सला-ए-आम* कि साक़ी रात गुज़रने वाली है| *Inviting All क़तील शिफ़ाई
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देख सितारों के मोती!
वो देख सितारों के मोती हर आन बिखरते जाते हैं, अफ़्लाक पे है कोहराम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है| क़तील शिफ़ाई
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उजला बादल!
आज एक बार मैं श्रेष्ठ हिन्दी नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत- सिरफिरी हवाओं के बलउड़ा करे उजला बादल । सूरज से कौन अब डरेकोहरा इतना…
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सदा क्यूँ नहीं देते!
क्या बीत गई अब के ‘फ़राज़’ अहल-ए-चमन पर, यारान-ए-क़फ़स मुझ को सदा क्यूँ नहीं देते| अहमद फ़राज़
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रहबर हो तो!
रहज़न हो तो हाज़िर है मता-ए-दिल-ओ-जाँ भी, रहबर हो तो मंज़िल का पता क्यूँ नहीं देते| अहमद फ़राज़
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मुजरिम हैं अगर हम
मुंसिफ़ हो अगर तुम तो कब इंसाफ़ करोगे, मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँ नहीं देते| अहमद फ़राज़
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दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते!
इक ये भी तो अंदाज़-ए-इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ है, ऐ चारागरो दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते| अहमद फ़राज़
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बुझा क्यूँ नहीं देते!
वहशत का सबब रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो नहीं है, मेहर ओ मह ओ अंजुम को बुझा क्यूँ नहीं देते| अहमद फ़राज़