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अभी फ़स्ल गुलों की!
हमें तुम पे गुमान-ए-वहशत था हम लोगों को रुस्वा किया तुम ने,अभी फ़स्ल गुलों की नहीं गुज़री क्यूँ दामन-ए-चाक सिया तुम ने| इब्न-ए-इंशा
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कामना!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अशोक जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं, आपको हास्य-व्यंग्य कविताओं के क्षेत्र में विशेष रूप से ख्याति मिली है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी…
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मैं सरमद ओ मंसूर!
मैं सरमद ओ मंसूर बना हूँ तिरी ख़ातिर,ये भी तिरी उम्मीद से कम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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पत्थर न पड़ें गर!
पत्थर न पड़ें गर सर-ए-बाज़ार तो कहना,तू मोतरिफ़-ए-हुस्न-ए-सनम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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हाथों में तिरे साग़र!
भूला तो न होगा तुझे सुक़रात का अंजाम,हाथों में तिरे साग़र-ए-सम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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मैं ने तो पुकारा है!
मैं ने तो पुकारा है मोहब्बत के उफ़क़ से,रस्ते में तिरे संग-ए-हरम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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उस दर पे तिरा सर!
जिस दर से नदामत के सिवा कुछ नहीं मिलता,उस दर पे तिरा सर भी जो ख़म है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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मुझे क़तरा भी मिला!
हाँ ले ले क़सम गर मुझे क़तरा भी मिला हो,तू शाकी-ए-अर्बाब-ए-करम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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अब तू भी सज़ावार!
क्या मैं ने कहा था कि ज़माने से भला कर,अब तू भी सज़ावार-ए-सितम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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ग़म है तो मुझे क्या!
ऐ दोस्त! तिरी आँख जो नम है तो मुझे क्या,मैं ख़ूब हँसूँगा तुझे ग़म है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई