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इक मोम के चोले में!
इक मोम के चोले में धागे का सफ़र दुनिया,अपने ही गले लग कर रोने की सज़ा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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तारीख़ बना पानी!
इस दुनिया में रहकर भी दुनिया में नहीं रहना,जिस दिन ये हुनर आया, तारीख़ बना पानी। सूर्यभानु गुप्त
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घर छोड़के निकलें तो!
घर छोड़के निकलें तो संसार के काम आएँ,कब धूप को पहने बिन बनता है घटा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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य़ूँ जम के गिरा पानी!
अँगनाई से तन-मन तक कुछ भी न बचा कोरा,इस बार के सावन में य़ूँ जम के गिरा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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दो शख़्स मिले ऐसे!
दस्तक दी दरे-दिल पर बरसात के मौसम ने,दो शख़्स मिले ऐसे जैसे कि हवा-पानी। सूर्यभानु गुप्त
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हमने तो लिखा बादल!
हर लफ़्ज़ का मानी से रिश्ता है बहुत गहरा,हमने तो लिखा बादल और उसने पढ़ा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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सहरा में जला पानी!
जब प्यास अँधेरों के घर बैठ गई जाकर,जलते हैं दीये जैसे सहरा में जला पानी। सूर्यभानु गुप्त
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बस धूप की तलवारें!
हर सिम्त मुक़ाबिल थीं बस धूप की तलवारें,पर आख़िरी क़तरे तक सहरा में लड़ा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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कमज़र्फ़ों के क़ब्ज़े में!
संसार में पानी से महरूम रहे प्यासे,कमज़र्फ़ों के क़ब्ज़े में हर युग में रहा पानी। सूर्यभानु गुप्त
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रे मन!
आज मैं हिंदी भाषा के वरिष्ठ राष्ट्रीय कवि स्वर्गीय सोहनलाल द्विवेदी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। द्विवेदी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय सोहनलाल द्विवेदी जी की यह कविता – प्रबल झंझावत में तूबन अचल हिमवान रे मन। हो बनी गम्भीर रजनी,सूझती…