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काफ़र के हो गए!
समझा रहे थे मुझ को सभी नासेहान-ए-शहर,फिर रफ़्ता रफ़्ता ख़ुद उसी काफ़र के हो गए| अहमद फ़राज़
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ऐ याद यार तुझ से !
ऐ याद यार तुझ से करें क्या शिकायतें,ऐ दर्द-ए-हिज्र हम भी तो पत्थर के हो गए| अहमद फ़राज़
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लोग थे कि जान से!
क्या लोग थे कि जान से बढ़ कर अज़ीज़ थे,अब दिल से महव नाम भी अक्सर के हो गए| अहमद फ़राज़
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अंदर वो नफ़रतें थीं!
फिर यूँ हुआ कि ग़ैर को दिल से लगा लिया,अंदर वो नफ़रतें थीं कि बाहर के हो गए| अहमद फ़राज़
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मीत, तुम जगते रहना!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| राही जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत – गाऊँ जब तक गीत मीत, तुम जगते रहना तुम मूंदोगे…
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उम्रें गुज़र जाती हैं नूर!
हाँ मगर तस्दीक़ में उम्रें गुज़र जाती हैं ‘नूर’, कुछ न कुछ रहता है सब को अपनी मंज़िल का पता| कृष्ण बिहारी नूर
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प्यार सच्चा है तो फिर!
ज़िंदाबाद ऐ दिल मिरे मैं भी हूँ तुझ से मुत्तफ़िक़, प्यार सच्चा है तो फिर कैसी वफ़ा कैसी जफ़ा| कृष्ण बिहारी नूर
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एक दिन मैं ख़ुद ही!
जब न मुझ से बन सकी उस तक रसाई की सबील, एक दिन मैं ख़ुद ही अपने रास्ते से हट गया| कृष्ण बिहारी नूर
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आइना-दर-आइना!
हुस्न-ओ-उलफ़त दोनों हैं अब एक सत्ह पर मगर, आइना-दर-आइना बस आइना-दर-आइना| कृष्ण बिहारी नूर