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तुझे सिर्फ़ तुझे देखूँगा!
देखने के लिए इक चेहरा बहुत होता है,आँख जब तक है तुझे सिर्फ़ तुझे देखूँगा| शहरयार
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दरवाज़ा खुला रक्खूँगा!
तेरे वा’दे को कभी झूट नहीं समझूँगा,आज की रात भी दरवाज़ा खुला रक्खूँगा| शहरयार
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समय पर कविता- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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मज़ा तो जब है कि!
कटी है जिस के ख़यालों में उम्र अपनी ‘मुनीर’,मज़ा तो जब है कि उस शोख़ को पता ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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कि मुझ को देख के!
मैं इस ख़याल से जाता नहीं वतन की तरफ़,कि मुझ को देख के उस बुत का जी बुरा ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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पलटना चाहें वहाँ से!
न जा कि इस से परे दश्त-ए-मर्ग हो शायद,पलटना चाहें वहाँ से तो रास्ता ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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ज़मीं के गिर्द भी पानी!
ज़मीं के गिर्द भी पानी ज़मीं की तह में भी,ये शहर जम के खड़ा है जो तैरता ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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दिखाई देता है जो!
निगाह-ए-आईना मालूम अक्स ना-मालूम,दिखाई देता है जो असल में छुपा ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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दीप थे अगणित !
आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं पर अपनी अमिट छाप छाप छोड़ने वाले कवि स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| अनेक आधुनिक कवियों को आगे बढ़ाने में अज्ञेय जी की महत्वपूर्ण भूमिका…