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ऐ दोस्त कहीं ये भी!
अब कारगह-ए-दहर में लगता है बहुत दिल,ऐ दोस्त कहीं ये भी तिरा ग़म तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
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शबनम तो नहीं है!
चाहे वो किसी का हो लहू दामन-ए-गुल पर,सय्याद ये कल रात की शबनम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
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कुछ ज़ख़्म ही खाएँ!
कुछ ज़ख़्म ही खाएँ चलो कुछ गुल ही खिलाएँ,हर-चंद बहाराँ का ये मौसम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
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सूरज से तिरा रंग!
गो रात मिरी सुब्ह की महरम तो नहीं है,सूरज से तिरा रंग-ए-हिना कम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
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सूनी साँझ!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के अत्यंत वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शिव मंगल सिंह सुमन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिव मंगल सिंह सुमन जी की यह कविता – बहुत दिनों में आज…
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सच मुझे लिखना है!
ता-कि महफ़ूज़ रहे मेरे क़लम की हुरमत,सच मुझे लिखना है मैं हुस्न को सच लिक्खूंगा| शहरयार
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सोचता रोज़ हूँ मैं!
शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है,सोचता रोज़ हूँ मैं घर से नहीं निकलूँगा| शहरयार