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घने धुएँ में फ़रिश्ते भी!
घने धुएँ में फ़रिश्ते भी आँख मलते हैं,तमाम रात खुजूरों के पेड़ जुलते हैं| बशीर बद्र
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सीपियों में पलते हैं!
उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं,ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं| बशीर बद्र
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सांसें !
आज मैं श्रेष्ठ राजस्थानी और हिंदी भाषा के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय हरीश भादानी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। भादानी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय हरीश भादानी जी का यह गीत – शहरीले जंगल में सांसें हलचल रचती जाएंकफ़न ओस का फाड़ बीच…