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ये आलम भी देखा है!
जिस तरह बादल का साया प्यास भड़काता रहे,मैं ने ये आलम भी देखा है तिरी तस्वीर का| अहमद फ़राज़
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कैसे पाया था तुझे!
कैसे पाया था तुझे फिर किस तरह खोया तुझे, मुझ सा मुंकिर भी तो क़ाएल हो गया तक़दीर का| अहमद फ़राज़
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ख़्वाब क्या देखा कि!
रात क्या सोए कि बाक़ी उम्र की नींद उड़ गई,ख़्वाब क्या देखा कि धड़का लग गया ताबीर का| अहमद फ़राज़
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खगोलशास्त्री- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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बात कर तुझ पर गुमाँ!
मुंतज़िर कब से तहय्युर है तिरी तक़रीर का, बात कर तुझ पर गुमाँ होने लगा तस्वीर का| अहमद फ़राज़
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ये भी इक सिलसिला!
शाइ’री ताज़ा ज़मानों की है मे’मार ‘फ़राज़’,ये भी इक सिलसिला-ए-कुन-फ़यकूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़
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रोज़ आ जाता है!
नासेहा तुझ को ख़बर क्या कि मोहब्बत क्या है,रोज़ आ जाता है समझाता है यूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़
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अब तुम आए हो!
अब तुम आए हो मिरी जान तमाशा करने,अब तो दरिया में तलातुम न सुकूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़
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तुम मोहब्बत में कहाँ!
तुम मोहब्बत में कहाँ सूद-ओ-ज़ियाँ ले आए,इश्क़ का नाम ख़िरद है न जुनूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़
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नोक-ए-हर-ख़ार पे!
तुम ने देखी ही नहीं दश्त-ए-वफ़ा की तस्वीर,नोक-ए-हर-ख़ार पे इक क़तरा-ए-ख़ूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़