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आज का ग़म न कर!
मिरी जान आज का ग़म न कर कि न जाने कातिब-ए-वक़्त ने,किसी अपने कल में भी भूल कर कहीं लिख रखी हों मसर्रतें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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सनम की मुरव्वतें!
जो तुम्हारी मान लें नासेहा तो रहेगा दामन-ए-दिल में क्या,न किसी अदू की अदावतें न किसी सनम की मुरव्वतें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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वरक़ तिरी याद के!
ये सुख़न जो हम ने रक़म किए ये हैं सब वरक़ तिरी याद के,कोई लम्हा सुब्ह-ए-विसाल का कोई शाम-ए-हिज्र की मुद्दतें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दूरियाँ कभी क़ुर्बतें!
सभी कुछ है तेरा दिया हुआ सभी राहतें सभी कुल्फ़तें,कभी सोहबतें कभी फ़ुर्क़तें कभी दूरियाँ कभी क़ुर्बतें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बुतों ने की हैं जहाँ में!
हम ऐसे सादा-दिलों की नियाज़-मंदी से,बुतों ने की हैं जहाँ में ख़ुदाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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अगरचे रह में हुईं!
पहुँच के दर पे तिरे कितने मो’तबर ठहरे,अगरचे रह में हुईं जग-हँसाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बहम हुए तो पड़ी हैं!
जुदा थे हम तो मयस्सर थीं क़ुर्बतें कितनी,बहम हुए तो पड़ी हैं जुदाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तुम आश्ना थे तो !
न अब रक़ीब न नासेह न ग़म-गुसार कोई,तुम आश्ना थे तो थीं आश्नाइयाँ क्या क्या| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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उस में होगी ख़ामी भी!
ऐसा तो मुमकिन ही नहीं है चाँद में कोई दाग़ न हो,जिस में होगी कुछ भी ख़ूबी उस में होगी ख़ामी भी| क़ैसर शमीम