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नोक-ए-हर-ख़ार पे!
तुम ने देखी ही नहीं दश्त-ए-वफ़ा की तस्वीर,नोक-ए-हर-ख़ार पे इक क़तरा-ए-ख़ूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़
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एक साया न दरूँ है!
जैसे कोई दर-ए-दिल पर हो सितादा कब से,एक साया न दरूँ है न बरूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़
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मुझे डर लगता है!
एक मुद्दत से मिरी माँ नहीं सोई ‘ताबिश’ मैं ने इक बार कहा था मुझे डर लगता है | अब्बास ताबिश
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मंज़िलें पाँव पकड़ती!
मंज़िलें पाँव पकड़ती हैं ठहरने के लिए शौक़ कहता है कि दो चार क़दम और सही साहिर लखनवी
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कहते हैं यूँ है यूँ है!
उस का अपना ही करिश्मा है फ़ुसूँ है यूँ है,यूँ तो कहने को सभी कहते हैं यूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़
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मेरी कुछ और रचनाएं-8
एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनको भी ढोल पीट लेता हूँ, क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और…