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देख सितारों के मोती!
वो देख सितारों के मोती हर आन बिखरते जाते हैं,अफ़्लाक पे है कोहराम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है| क़तील शिफ़ाई
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आओ मिल आएँ !
दो घड़ी आओ मिल आएँ किसी ‘ग़ालिब’ से ‘क़तील’,हज़रत-ए-‘ज़ौक़’ तो वाबस्ता हैं दरबार के साथ| क़तील शिफ़ाई
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जान ले ले मिरी!
दुश्मनी मुझ से किए जा मगर अपना बन कर,जान ले ले मिरी सय्याद मगर प्यार के साथ| क़तील शिफ़ाई
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लफ़्ज़ चुनता हूँ तो!
लफ़्ज़ चुनता हूँ तो मफ़्हूम बदल जाता है,इक न इक ख़ौफ़ भी है जुरअत-ए-इज़हार के साथ| क़तील शिफ़ाई
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ग़म-ए-यार के साथ!
किस तरह अपनी मोहब्बत की मैं तकमील करूँ,ग़म-ए-हस्ती भी तो शामिल है ग़म-ए-यार के साथ| क़तील शिफ़ाई
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दुश्मनी धूप की है!
ग़म लगे रहते हैं हर आन ख़ुशी के पीछे,दुश्मनी धूप की है साया-ए-दीवार के साथ| क़तील शिफ़ाई
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वक़्त की रफ़्तार!
राब्ता लाख सही क़ाफ़िला-सालार के साथ,हम को चलना है मगर वक़्त की रफ़्तार के साथ| क़तील शिफ़ाई
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आशा – 1 / कामायनी
आज एक बार मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि और छायावाद युग के एक स्तंभ स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी के महाकाव्य कामायनी का एक अंश शेयर कर रहा हूँ| प्रसाद जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह रचना – ऊषा सुनहले तीर बरसती,जयलक्ष्मी-सी उदित…