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घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय मुक्तिबोध जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। मुक्तिबोध जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए प्रस्तुत है मुक्तिबोध जी की ये कविता- घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगातेरी प्रत्यंचा का कम्पन सूनेपन का भार हरेगाहिमवत, जड़, निःस्पन्द हृदय के…
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दरिया रवाँ-दवाँ हैं!
बस तिश्नगी की आँख से देखा करो उन्हें,दरिया रवाँ-दवाँ हैं चमकते सराब के| आदिल मंसूरी
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जाले थे ख़्वाब के!
सोए तो दिल में एक जहाँ जागने लगा,जागे तो अपनी आँख में जाले थे ख़्वाब के। आदिल मंसूरी
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नक़्श उठ आए गुलाब के!
फूलों की सेज पर ज़रा आराम क्या कियाउस गुल-बदन पे नक़्श उठ आए गुलाब के आदिल मंसूरी
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वो जो तुम्हारे हाथ से!
वो जो तुम्हारे हाथ से आ कर निकल गयाहम भी क़तील हैं उसी ख़ाना-ख़राब के आदिल मंसूरी
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आशिक़ थे शहर में!
आशिक़ थे शहर में जो पुराने शराब केहैं उन के दिल में वसवसे अब एहतिसाब* के *Thinking About Results आदिल मंसूरी
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ये क्या सितम है कि!
ये क्या सितम है कि इस नश्शा-ए-मोहब्बत में,तिरे सिवा भी किसी को पुकार आए हम| अज़हर इक़बाल
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तिरे बग़ैर जो उम्रें!
तिरे ही लम्स से उन का ख़िराज मुमकिन है, तिरे बग़ैर जो उम्रें गुज़ार आए हम| अज़हर इक़बाल