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सैंकड़ों डूब गए!
रस उन आँखों का है कहने को ज़रा सा पानी,सैंकड़ों डूब गए फिर भी है इतना पानी| आरज़ू लखनवी
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इस में अपना-आप!
फटा-पुराना ख़्वाब है मेरा फिर भी ‘ताबिश‘, इस में अपना-आप छुपाया जा सकता है| अब्बास ताबिश
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रात की पेशानी का!
ये महताब ये रात की पेशानी का घाव,ऐसा ज़ख़्म तो दिल पर खाया जा सकता है| अब्बास ताबिश
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इश्क़ में कितना नाम!
मुझ गुमनाम से पूछते हैं फ़रहाद ओ मजनूँ,इश्क़ में कितना नाम कमाया जा सकता है| अब्बास ताबिश
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पानी आँख में भर कर!
पानी आँख में भर कर लाया जा सकता है,अब भी जलता शहर बचाया जा सकता है| अब्बास ताबिश
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जो मुझको किसी और!
वो कौन है उस से तो मैं वाक़िफ़ भी नहीं हूँ,जो मुझ को किसी और का होने नहीं देता| अब्बास ताबिश