Category: Uncategorized
-
अब एहतियात की !
अब एहतियात की कोई सूरत नहीं रही,क़ातिल से रस्म-ओ-राह सिवा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
सब कुछ निसार!
क़र्ज़-ए-निगाह-ए-यार अदा कर चुके हैं हम,सब कुछ निसार-ए-राह-ए-वफ़ा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
किसी की ख़ास अदा!
ये काएनात तो लगता है ‘नूर’ जैसे हो,किसी की ख़ास अदा से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर
-
हथेलियों पे हिना से!
कभी खुलेंगी अगर मुट्ठियाँ तो देखेंगे,हथेलियों पे हिना से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर
-
हवा से लिखा हुआ!
मगर ये क़ुव्वत-ए-बीनाई किस तरह आई,हवा में देखा हवा से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर
-
फ़लक पे काली घटा!
कभी कभी तो बरसते हुए भी देखा है,फ़लक पे काली घटा से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर
-
अंतराल!
आज मैं एक श्रेष्ठ आधुनिक कवि स्वर्गीय मंगलेश डबराल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। डबराल जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मंगलेश डबराल जी की यह कविता – हरा पहाड़ रात मेंसिरहाने खड़ा हो जाता हैशिखरों से टकराती हुई तुम्हारी आवाज़सीलन-भरी घाटी में…
-
अजीब बात है पढ़िए!
अजीब बात है पढ़िए तो हर्फ़ उड़ने लगें,बदन बदन पे क़बा से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर
-
चमकता रहता है जब!
चमकता रहता है जब तक कुरेदी जाए न राख,चिता पे दस्त-ए-फ़ना से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर
-
ख़ुशबुओं के लब पर!
जो सुन सको तो सुनो ख़ुशबुओं के लब पर है,गुलों पे बाद-ए-सबा से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर