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फ़ासला है ख़्वाबों का!
जागती हक़ीक़त तक रास्ता है ख़्वाबों का,दरमियाँ मिरे उन के फ़ासला है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर
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ज़िंदगी नाम है!
हर नफ़स उम्र-ए-गुज़िश्ता की है मय्यत ‘फ़ानी’,ज़िंदगी नाम है मर मर के जिए जाने का| फ़ानी बदायुनी
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आप की जान से दूर!
कहते हैं क्या ही मज़े का है फ़साना ‘फ़ानी‘, आप की जान से दूर आप के मर जाने का| फ़ानी बदायुनी
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किस की आँखें!
किस की आँखें दम-ए-आख़िर मुझे याद आई हैं,दिल मुरक़्क़ा’ है छलकते हुए पैमाने का| फ़ानी बदायुनी
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कहीं पाया न ठिकाना!
हम ने छानी हैं बहुत दैर ओ हरम की गलियाँ,कहीं पाया न ठिकाना तिरे दीवाने का| फ़ानी बदायुनी
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लौह दिल को ग़म!
लौह दिल को ग़म-ए-उल्फ़त को क़लम कहते हैं,कुन है अंदाज़-ए-रक़म हुस्न के अफ़्साने का| फ़ानी बदायुनी
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हँसो भाई पेड़!
आज मैं नवगीत विधा के प्रसिद्ध हस्ताक्षर स्वर्गीय माहेश्वर तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| तिवारी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत – कहती है दूबहँसो भाई पेड़बाहर जितना देखते होधरती मेंधसों भाई पेड़ । जड़ें बहुत…
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लिए जाते हैं जनाज़ा!
हड्डियाँ हैं कई लिपटी हुई ज़ंजीरों में,लिए जाते हैं जनाज़ा तिरे दीवाने का| फ़ानी बदायुनी
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दिल से पहुँची तो हैं!
दिल से पहुँची तो हैं आँखों में लहू की बूँदें,सिलसिला शीशे से मिलता तो है पैमाने का| फ़ानी बदायुनी