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चमकता रहता है जब!
चमकता रहता है जब तक कुरेदी जाए न राख,चिता पे दस्त-ए-फ़ना से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर
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ख़ुशबुओं के लब पर!
जो सुन सको तो सुनो ख़ुशबुओं के लब पर है,गुलों पे बाद-ए-सबा से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर
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न पढ़ सकेगा बशर!
हर इक की अपनी ज़बाँ है न पढ़ सकेगा बशर,ज़मीं पे आब-ओ-हवा से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर
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लिखा हुआ इक नाम!
ख़मोशियों में सदा से लिखा हुआ इक नाम,सुनो है दस्त-ए-दुआ से लिखा हुआ इक नाम| कृष्ण बिहारी नूर
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मीर-ए-कारवाँ मैं हूँ!
गर्द-ए-राह की सूरत साँस साँस है ऐ ‘नूर’,मीर-ए-कारवाँ मैं हूँ क़ाफ़िला है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर
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नश्शे का ये आलम है!
नश्शे का ये आलम है सच ही सच लगे सब कुछ,ज़िंदगी की सहबा है मय-कदा है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर
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अपनी अपनी ताबीरें!
अपनी अपनी ताबीरें ढूँढता है हर चेहरा,चेहरा चेहरा पढ़ लीजे तज़्किरा है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर
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जीवन की ही जय हो!
आज मैं आधुनिक हिंदी कविता का आधार तैयार करने वाले शीर्ष कवि स्वर्गीय मैथिली शरण गुप्त जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ जिनको राष्ट्रकवि भी कहा जाता है। गुप्त जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मैथिली शरण गुप्त जी की यह कविता – मृषा…
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हौसला है ख़्वाबों का!
देखें इस कशाकश का इख़्तिताम हो कब तक, जागने की ख़्वाहिश है हौसला है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर
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सिलसिला ख़्वाबों का!
एक शब के टुकड़ों के नाम मुख़्तलिफ़ रखे,जिस्म-ओ-रूह का बंधन सिलसिला है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर