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हर ज़ुल्म को रज़ा!
अपने लिए अब एक ही राह-ए-नजात है,हर ज़ुल्म को रज़ा-ए-ख़ुदा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
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इंसान का अगर क़द!
इंसान का अगर क़द-ओ-क़ामत न बढ़ सके,तुम इस को नक़्स-ए-आब-ओ-हवा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
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घटा कह लिया करो!
यारो ये दौर ज़ोफ़-ए-बसारत का दौर है,आँधी उठे तो उस को घटा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
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सूनापन चहका चहका!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री यश मालवीय जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। यश जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री यश मालवीय जी का यह गीत – अभिवादन बादल-बादलख़बर लिये वन-उपवन कीकितने आशीर्वाद लियेपहली बरखा सावन की बरस-बरस हैं घन बरसेअब की भी…
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जितने सनम हैं!
गर चाहते हो ख़ुश रहें कुछ बंदगान-ए-ख़ास,जितने सनम हैं उन को ख़ुदा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
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ख़ुद को फ़रेब दो!
ख़ुद को फ़रेब दो कि न हो तल्ख़ ज़िंदगी,हर संग-दिल को जान-ए-वफ़ा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
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ग़म-ख़्वार तुम्हारे!
तज दिया तुम ने दर-ए-यार भी उकता के ‘फ़राज़’,अब कहाँ ढूँढने ग़म-ख़्वार तुम्हारे जाएँ| अहमद फ़राज़
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जी जान से हारे जाएँ!
हम कि नादान जुआरी हैं सभी जानते हैं,दिल की बाज़ी हो तो जी जान से हारे जाएँ| अहमद फ़राज़
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दुल्हन को सँवारे जाएँ!
बाप लर्ज़ां है कि पहुँची नहीं बारात अब तक,और हम-जोलियाँ दुल्हन को सँवारे जाएँ| अहमद फ़राज़