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रोग मिटाने आ जाते!
कौन सा वो जादू है जिस से ग़म की अँधेरी सर्द गुफा में,लाख निसाई साँस दिलों के रोग मिटाने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी
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फूल चढ़ाने आ जाते!
जिन लोगों ने उन की तलब में सहराओं की धूल उड़ाई,अब ये हसीं उन की क़ब्रों पर फूल चढ़ाने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी
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रंग पुराने आ जाते हैं!
दिन भर जो सूरज के डर से गलियों में छुप रहते हैं,शाम आते ही आँखों में वो रंग पुराने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी
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जब भी घर की छत!
जब भी घर की छत पर जाएँ नाज़ दिखाने आ जाते हैं,कैसे कैसे लोग हमारे जी को जलाने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी
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जो चाहा बना दिया!
मिरे पास ऐसा तिलिस्म है जो कई ज़मानों का इस्म है,उसे जब भी सोचा बुला लिया उसे जो भी चाहा बना दिया| मुनीर नियाज़ी
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काया में परछाई जैसे!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी गीतकार स्वर्गीय राजेंद्र राजन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। राजन जी की अधिक रचना मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राजेंद्र राजन जी का यह गीत – मौसम में पुरवाई जैसेसूरज में गरमाई जैसेढकी-छुपी सी तुम हो मुझमेंकाया में परछाई जैसे नदिया को…
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ये जो लाल रंग पतंग!
ये जो लाल रंग पतंग का सर-ए-आसमाँ है उड़ा हुआ, ये चराग़ दस्त-ए-हिना का है जो हवा में उस ने जला दिया| मुनीर नियाज़ी
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जो जहाँ में कोई न!
यही आन थी मिरी ज़िंदगी लगी आग दिल में तो उफ़ न की,जो जहाँ में कोई न कर सका वो कमाल कर के दिखा दिया| मुनीर नियाज़ी
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कोई अपना वहम था!
कोई ऐसी बात ज़रूर थी शब-ए-व’अदा वो जो न आ सका,कोई अपना वहम था दरमियाँ या घटा ने उस को डरा दिया| मुनीर नियाज़ी
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गुल सा खिला दिया!
शब-ए-माहताब ने शह-नशीं पे अजीब गुल सा खिला दिया,मुझे यूँ लगा किसी हाथ ने मिरे दिल पे तीर चला दिया| मुनीर नियाज़ी