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मिरा अंजाम भी तो है!
मुंकिर नहीं कोई भी वफ़ा का मगर ‘क़तील’,दुनिया के सामने मिरा अंजाम भी तो है| क़तील शिफ़ाई
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वो आँख सिर्फ़ आँख!
ए तिश्ना-काम-ए-शौक़ इसे आज़मा के देख,वो आँख सिर्फ़ आँख नहीं जाम भी तो है| क़तील शिफ़ाई
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इक नाम उस का!
हम जानते हैं जिस को किसी और नाम से,इक नाम उस का गर्दिश-ए-अय्याम भी तो है| क़तील शिफ़ाई
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रस्ते में झूमती हुई!
कर तो लिया है क़स्द इबादत की रात का,रस्ते में झूमती हुई इक शाम भी तो है| क़तील शिफ़ाई
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आख़िर बुरी है क्या!
आख़िर बुरी है क्या दिल-ए-नाकाम की ख़लिश,साथ उस के एक लज़्ज़त-ए-बे-नाम भी तो है| क़तील शिफ़ाई
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स्वप्न!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी कोई रचना मैंने पहले शेयर नहीं की है। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद सिंह जी की यह कविता – स्वप्न…कच्ची नींद का पाहुन,बेवफ़ा है,– दीठ से…भागेपीठ-पीछे कोसने कोबंद पलकों मेंसदा जागे,एक खुशबू से बदल दे…
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रोने के बाद कुछ हमें !
पलकों पे अब नहीं है वो पहला सा बार-ए-ग़म,रोने के बा’द कुछ हमें आराम भी तो है| क़तील शिफ़ाई
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आँखें हर इक हसीन!
आँखें हर इक हसीन की बे-फ़ैज़ तो नहीं,कुछ सागरों में बादा-ए-गुलफ़ाम भी तो है| क़तील शिफ़ाई
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अच्छा सही ‘क़तील’!
उस पर तुम्हारे प्यार का इल्ज़ाम भी तो है,अच्छा सही ‘क़तील’ प बदनाम भी तो है| क़तील शिफ़ाई
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जब दिल जले तो!
ले दे के अब यही है निशान-ए-ज़िया ‘क़तील’,जब दिल जले तो इस को दिया कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई