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गर्दिश-ए-वक़्त का!
गर्दिश-ए-वक़्त का कितना बड़ा एहसाँ है कि आज,ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें। शहरयार
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दिल में वो दर्द न!
दिल में वो दर्द न आँखों में वो तुग़्यानी है,जाने किस सम्त ये दुनिया लिए जाती है हमें। शहरयार
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मंज़िल-ए-बे-नाम!
फिर कहीं ख़्वाब ओ हक़ीक़त का तसादुम होगा,फिर कोई मंज़िल-ए-बे-नाम बुलाती है हमें। शहरयार
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हँसी आती है हमें!
मरकज़-ए-दीदा-ओ-दिल तेरा तसव्वुर था कभी,आज इस बात पे कितनी हँसी आती है हमें। शहरयार
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रंग दिखाती है हमें!
तुझ से बिछड़े हैं तो अब किस से मिलाती है हमें,ज़िंदगी देखिए क्या रंग दिखाती है हमें। शहरयार
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फाँसी पर टंग गया आकाश!
आज मैं श्रेष्ठ व्यंग्यकार और हिंदी कवि स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। त्यागी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की यह कविता – फाँसी पर टंग गया आकाशसमुद्र अपने ही भँवर में डूब गयाखाइयों में से निकलकर…