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कहाँ है बू-ए-वफ़ा!
वो कौन है जो नहीं अपनी मस्लहत का ग़ुलाम,कहाँ है बू-ए-वफ़ा अब वफ़ा के बंदों में| क़ैसर शमीम
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है इंतिशार का आलम!
न कोई सम्त मुक़र्रर न कोई जा-ए-क़रार,है इंतिशार* का आलम हवा के बंदों में| *परेशानी क़ैसर शमीम
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कहाँ है कोई ख़ुदा का!
कहाँ है कोई ख़ुदा का ख़ुदा के बंदों में,घिरा हुआ हूँ अभी तक अना के बंदों में| क़ैसर शमीम
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तुम मुझे क्षमा करो!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय राजकमल चौधरी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। राजकमल चौधरी जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राजकमल चौधरी जी की यह कविता – बहुत अंधी थीं मेरी प्रार्थनाएँ।मुस्कुराहटें मेरी विवशकिसी भी चंद्रमा के चतुर्दिकउगा नहीं पाई आकाश-गंगालगातार फूल-…
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दूर की सदा क्या है!
उदास रात की ख़ामोशियों में ऐ ‘क़ैसर’,क़रीब आती हुई दूर की सदा क्या है| क़ैसर शमीम
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रहेगी धूप मिरे सर पे!
रहेगी धूप मिरे सर पे आख़िरी दिन तक,जवाँ है पेड़ मगर उस का आसरा क्या है| क़ैसर शमीम
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देखूँ कि इंतिहा क्या है!
अभी तो काट रही है हर एक साँस की धार,अज़ल जब आए तो देखूँ कि इंतिहा क्या है| क़ैसर शमीम
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भूली-बिसरी तस्वीरें!
नज़र की धुँद में हैं भूली-बिसरी तस्वीरें,पलट के देखने वाले ये देखना क्या है| क़ैसर शमीम