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राह नज़दीक की!
दिल में भी मिलता है वो काबा भी उस का है मक़ाम, राह नज़दीक की ऐ अज़्म-ए-सफ़र पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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तीर बन जाए निशाना!
मुझ से कहती है कड़क कर ये कमाँ क़ातिल की,तीर बन जाए निशाना वो जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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अभी घर पैदा कर!
मुझ से घर आने के वादे पर बिगड़ कर बोले,कह दिया ग़ैर के दिल में अभी घर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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दिन निकलने को है!
दिन निकलने को है राहत से गुज़र जाने दे,रूठ कर तू न क़यामत की सहर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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रंज सहने को हमारा!
शिकवा-ए-दर्द-ए-जुदाई पे वो फ़रमाते हैं,रंज सहने को हमारा सा जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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अपनी क़ुदरत से!
मिट के भी दूरी-ए-गुलशन नहीं भाती या रब,अपनी क़ुदरत से मिरी ख़ाक में पर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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आग पानी में भी!
मुझ को रोता हुआ देखें तो झुलस जाएँ रक़ीब,आग पानी में भी ऐ सोज़-ए-जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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उतना तुम पर विश्वास बढ़ा!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय रामेश्वर शुक्ल अंचल जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। अंचल जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामेश्वर शुक्ल अंचल जी का आस्था से भरा यह गीत – बाहर के आँधी पानी से मन का तूफ़ान कहीं बढ़ कर,बाहर के…
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और सहर पैदा कर!
सुब्ह-ए-फ़ुर्क़त तो क़यामत की सहर है या रब,अपने बंदों के लिए और सहर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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मेरी नज़र पैदा कर!
आईना देखना इस हुस्न पे आसान नहीं,पेश-तर आँख मिरी मेरी नज़र पैदा कर| बेख़ुद देहलवी