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धीरे धीरे हारे लोग!
जीवन जीवन हम ने जग में खेल यही होते देखा,धीरे धीरे जीती दुनिया धीरे धीरे हारे लोग| जावेद अख़्तर
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जाड़ा: दो कविताएँ!
आज मैं प्रसिद्ध साहित्यकार और कवि श्री रामदरश मिश्र जी की सर्दी के मौसम पर लिखी गई दो कविताएं शेयर कर रहा हूँ। मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र की यह ग़ज़ल – एक माघ की ठंडी हवाएँ डंक मार रही हैं,गर्म…
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कैसे हैं बेचारे लोग!
दुख के जंगल में फिरते हैं कब से मारे मारे लोग, जो होता है सह लेते हैं कैसे हैं बेचारे लोग| जावेद अख़्तर
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तिरा क्या ख़याल है!
फिर कोई ख़्वाब देखूँ कोई आरज़ू करूँ,अब ऐ दिल-ए-तबाह तिरा क्या ख़याल है| जावेद अख़्तर
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ये मेरा ही जाल है!
बे-दस्त-ओ-पा हूँ आज तो इल्ज़ाम किस को दूँ,कल मैं ने ही बुना था ये मेरा ही जाल है| जावेद अख़्तर
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मुझे क्या मलाल है!
घर से चला तो दिल के सिवा पास कुछ न था,क्या मुझ से खो गया है मुझे क्या मलाल है| जावेद अख़्तर
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क्या मेरा हाल है!
मैं ख़ुद भी सोचता हूँ ये क्या मेरा हाल है,जिस का जवाब चाहिए वो क्या सवाल है| जावेद अख़्तर
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जवानी की शरारत!
मुझ को ख़ुद अपनी जवानी की क़सम है कि ये इश्क़,इक जवानी की शरारत के सिवा कुछ भी नहीं| जाँ निसार अख़्तर
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एक ख़ामोश क़यामत!
दिल में वो शोरिश-ए-जज़्बात कहाँ तेरे बग़ैर,एक ख़ामोश क़यामत के सिवा कुछ भी नहीं| जाँ निसार अख़्तर
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नववर्ष -2025 की शुभकामना
समय को कौन रोक सकता है जी! दिन, माह, वर्ष बदलते ही जाते हैं, 2024 को भी जाना था, चला गया है। किसी कवि की काव्य पंक्ति पहले भी मैंने दोहराई हैं – आने वाले स्वागत, जाने वाले विदा अगले चौराहे पर इंतज़ार, शुक्रिया। बहुत से लोग यही शिकायत करते रहते हैं कि दिन, माह,…