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क़ाफ़िला ख़्वाबों का!
गर्द-ए-राह की सूरत साँस साँस है ऐ ‘नूर’,मीर-ए-कारवाँ मैं हूँ क़ाफ़िला है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर
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जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे !
आज मैं शृंगार और ओज दोनो प्रकार की श्रेष्ठतम रचनाएं देने वाले, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की एक ओजपूर्ण कविता शेयर कर रहा हूँ। दिनकर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की यह कविता – वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा…
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तज़्किरा है ख़्वाबों का!
अपनी अपनी ताबीरें ढूँढता है हर चेहरा,चेहरा चेहरा पढ़ लीजे तज़्किरा है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर
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हौसला है ख़्वाबों का!
देखें इस कशाकश का इख़्तिताम हो कब तक, जागने की ख़्वाहिश है हौसला है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर
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सिलसिला ख़्वाबों का!
एक शब के टुकड़ों के नाम मुख़्तलिफ़ रखे,जिस्म-ओ-रूह का बंधन सिलसिला है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर
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फ़ासला है ख़्वाबों का!
जागती हक़ीक़त तक रास्ता है ख़्वाबों का,दरमियाँ मिरे उन के फ़ासला है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर
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हम ठहरे बंजारे लोग!
इस नगरी में क्यूँ मिलती है रोटी सपनों के बदले,जिन की नगरी है वो जानें हम ठहरे बंजारे लोग| जावेद अख़्तर
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कैसे प्यारे प्यारे लोग!
नेकी इक दिन काम आती है हम को क्या समझाते हो,हम ने बे-बस मरते देखे कैसे प्यारे प्यारे लोग| जावेद अख़्तर
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साँसों के इक्तारे लोग!
वक़्त सिंघासन पर बैठा है अपने राग सुनाता है,संगत देने को पाते हैं साँसों के इक्तारे लोग| जावेद अख़्तर