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हीरा बना के रक्खा है!
तमाम उम्र का हासिल है ये हुनर मेरा,कि मैं ने शीशे को हीरा बना के रक्खा है| मुनव्वर राना
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यहाँ पे कोई बचाने!
यहाँ पे कोई बचाने तुम्हें न आएगा,समुंदरों ने जज़ीरा बना के रक्खा है| मुनव्वर राना
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लालटेन!
आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि श्री राजा खुगशाल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। खुगशाल जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री राजा खुगशाल जी की यह कविता – अंधेरी रातों मेंइसके उजाले मेंपहाड़े रटते थे हमबैलों के रस्से बटते थे– डूंगर काकाइसके उजाले…
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ये बुत जो हम ने!
ये बुत जो हम ने दोबारा बना के रक्खा है,इसी ने हम को तमाशा बना के रक्खा है| मुनव्वर राना
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बेवफ़ाई खेल का!
बेवफ़ाई खेल का हिस्सा है जाने दे इसे,तज़्किरा उस से न कर शर्मिंदगी बढ़ जाएगी| मुनव्वर राना
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आप के हँसने से!
आप के हँसने से ख़तरा और भी बढ़ जाएगा,इस तरह तो और आँखों की नमी बढ़ जाएगी| मुनव्वर राना
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दुश्मनी बढ़ जाएगी!
इतनी चाहत से न देखा कीजिए महफ़िल में आप,शहर वालों से हमारी दुश्मनी बढ़ जाएगी| मुनव्वर राना
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आप के आने से थोड़ी!
मौत का आना तो तय है मौत आएगी मगर,आप के आने से थोड़ी ज़िंदगी बढ़ जाएगी| मुनव्वर राना
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रौशनी बढ़ जाएगी!
मुख़्तसर होते हुए भी ज़िंदगी बढ़ जाएगी,माँ की आँखें चूम लीजे रौशनी बढ़ जाएगी| मुनव्वर राना