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रंग के कोहरे की!
दूसरी सम्त हैं ख़ुशबू के उफ़ुक़ की सुब्हें,रंग के कोहरे की दीवार गिरा दे कोई| नज़ीर क़ैसर
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जैसे सन्नाटे में !
यूँ तुझे देख के चौंक उठती हैं सोई यादें,जैसे सन्नाटे में आवाज़ लगा दे कोई| नज़ीर क़ैसर
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तस्वीर बना दे कोई!
दिल की तख़्ती सर-ए-बाज़ार लिए फिरता हूँ,काश इस पर तिरी तस्वीर बना दे कोई| नज़ीर क़ैसर
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नज़रों से छुपा दे कोई!
ढूँढता फिरता हूँ यूँ अपने ही क़दमों के निशाँ,जैसे मुझ को मिरी नज़रों से छुपा दे कोई| नज़ीर क़ैसर
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मुझे मेरा पता दे कोई!
ग़रज़ इस से नहीं वो कौन है किस भेस में है,मैं कहाँ पर हूँ मुझे मेरा पता दे कोई| नज़ीर क़ैसर
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आंधी!
आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि श्री लीलाधर जगूड़ी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री लीलाधर जगूड़ी जी की यह कविता – रात वह हवा चली जिसे आँधी कहते हैंउसने कुछ दरवाजे भड़भड़ाएकुछ खिड़कियाँ झकझोरीं, कुछ पेड़ गिराएकुछ जानवरों…
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मेरी आँखों को मिरी!
मेरी आँखों को मिरी शक्ल दिखा दे कोई, काश मुझ को मिरा एहसास दिला दे कोई| नज़ीर क़ैसर
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वो बे-ज़बाँ निकले!
सितम के दौर में हम अहल-ए-दिल ही काम आए,ज़बाँ पे नाज़ था जिन को वो बे-ज़बाँ निकले| साहिर लुधियानवी
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उधर भी ख़ाक उड़ी!
उधर भी ख़ाक उड़ी है इधर भी ख़ाक उड़ी,जहाँ जहाँ से बहारों के कारवाँ निकले| साहिर लुधियानवी
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हक़ीक़तें हैं सलामत !
हक़ीक़तें हैं सलामत तो ख़्वाब बहुतेरे,मलाल क्यूँ हो कि कुछ ख़्वाब राएगाँ निकले| साहिर लुधियानवी