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नववर्ष -2025 की शुभकामना
समय को कौन रोक सकता है जी! दिन, माह, वर्ष बदलते ही जाते हैं, 2024 को भी जाना था, चला गया है। किसी कवि की काव्य पंक्ति पहले भी मैंने दोहराई हैं – आने वाले स्वागत, जाने वाले विदा अगले चौराहे पर इंतज़ार, शुक्रिया। बहुत से लोग यही शिकायत करते रहते हैं कि दिन, माह,…
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मिरी दुनिया से गुज़र!
फ़ित्ना-ए-अक़्ल के जूया मिरी दुनिया से गुज़र,मेरी दुनिया में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं| जाँ निसार अख़्तर
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मय-कशी अब मिरी!
मय-कशी अब मिरी आदत के सिवा कुछ भी नहीं,ये भी इक तल्ख़ हक़ीक़त के सिवा कुछ भी नहीं| जाँ निसार अख़्तर
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तुम्हीं ने शाइरी दी है!
कहाँ मुमकिन था कोई काम हम जैसे दिवानों से,तुम्हीं ने गीत लिखवाए तुम्हीं ने शाइरी दी है| जाँ निसार अख़्तर
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हर इक दरवेश ने !
मिरी आवारगी भी इक करिश्मा है ज़माने में,हर इक दरवेश ने मुझ को दुआ-ए-ख़ैर ही दी है| जाँ निसार अख़्तर
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मिरी आँखों को आँसू!
मोहब्बत ना-रवा तक़्सीम की क़ाएल नहीं फिर भी,मिरी आँखों को आँसू तेरे होंटों को हँसी दी है| जाँ निसार अख़्तर
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पिघलते आबशारों ने!
नज़र को सब्ज़ मैदानों ने क्या क्या वुसअतें बख़्शीं,पिघलते आबशारों ने हमें दरिया-दिली दी है| जाँ निसार अख़्तर
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किसी ने धूप बख़्शी है!
मिरे ख़ल्वत-कदे के रात दिन यूँही नहीं सँवरेकिसी ने धूप बख़्शी है किसी ने चाँदनी दी है जाँ निसार अख़्तर
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शगुफ़्ता ताज़गी दी है!
बहुत दिल कर के होंटों की शगुफ़्ता ताज़गी दी है,चमन माँगा था पर उस ने ब-मुश्किल इक कली दी है| जाँ निसार अख़्तर
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क्या वो दिन भी दिन हैं!
आज मैं प्रसिद्ध साहित्यकार और शायर स्वर्गीय राही मासूम रज़ा साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ। राही मासूम रज़ा साहब की रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राही मासूम रज़ा साहब की यह ग़ज़ल – क्या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराएक्या वो…