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मेरी नज़र पैदा कर!
आईना देखना इस हुस्न पे आसान नहीं,पेश-तर आँख मिरी मेरी नज़र पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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बातों में असर पैदा!
झूट जब बोलते हैं वो तो दुआ होती है,या इलाही मिरी बातों में असर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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थम ज़रा ऐ अदम!
थम ज़रा ऐ अदम-आबाद के जाने वाले,रह के दुनिया में अभी ज़ाद-ए-सफ़र पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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और जिगर पैदा कर!
काम लेने हैं मोहब्बत में बहुत से या रब,और दिल दे हमें इक और जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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पहले तू अपना दहन!
फिर हमारा दिल-ए-गुम-गश्ता भी मिल जाएगा,पहले तू अपना दहन अपनी कमर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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असर पैदा कर!
दूद-ए-दिल इश्क़ में इतना तो असर पैदा कर,सर कटे शम्अ की मानिंद तो सर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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ये नहीं है सही वक़्त!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय राजकुमार कुंभज जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। कुंभज जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। आप अज्ञेय जी द्वारा संपादित चौथा सप्तक में सम्मिलित थे। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राजकुमार कुंभज जी की यह कविता – एक खिलाबुझ गया दूसरा उसी वक़्तसही…
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जो इधर दिल में है !
दे मोहब्बत तो मोहब्बत में असर पैदा कर,जो इधर दिल में है या रब वो उधर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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सुख़न शनास है!
सुख़न शनास है कितना ये पूछ लूँ ‘क़ैसर’,नज़र वो आए जो हर्फ़-ओ-नवा के बंदों में| क़ैसर शमीम
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सज़ाएँ मेरी तरह!
सज़ाएँ मेरी तरह हँस के झेलने वाला,नहीं है कोई भी अहद-ए-सज़ा के बंदों में| क़ैसर शमीम