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कोई शख़्स मर गया यारो!
वो कौन था वो कहाँ का था क्या हुआ था उसे,सुना है आज कोई शख़्स मर गया यारो| शहरयार
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नक़्श तमन्ना का हो गया धुंधला!
हर एक नक़्श तमन्ना का हो गया धुंधला,हर एक ज़ख़्म मेरे दिल का भर गया यारो| शहरयार
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तन है केवल, प्राण कहाँ हैं !
हमारी हिन्दी फिल्मों के लिए असंख्य लोकप्रिय गीत लिखने वाले, जनकवि शैलेन्द्र जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| शैलेन्द्र जी ने जो कुछ भी लिखा उसमें उनकी अलग छाप दिखाई देती है| आज की इस कविता में भी कुछ ऐसे गहन भाव हैं जो अभिव्यक्त करते हैं कि जीवन में अभाव कैसे-कैसे…
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मिसरे उसी ग़ज़ल के हैं!
जो आधे में छूटी हम,मिसरे उसी ग़ज़ल के हैं। बिछे पाँव में क़िस्मत है,टुकड़े तो मखमल के हैं। बालस्वरूप राही