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सिर्फ़ ख़य्याम का घर हो!
मय-कशी के लिए ख़ामोश भरी महफ़िल में, सिर्फ़ ख़य्याम का घर हो ये ज़रूरी तो नहीं| ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी
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नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है!
नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है, उनकी आग़ोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं | ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी
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या लब-ए-साग़र से पियो!
चश्म-ए-साक़ी से पियो या लब-ए-साग़र से पियो, बे-ख़ुदी आठों पहर हो ये ज़रूरी तो नहीं| ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी
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मन जाने क्या से क्या हो गया!
एक बार फिर से आज मैं हिन्दी के प्रमुख कवि एवं गीतकार, काव्य मंचों पर अपने मधुर गीतों के माध्यम से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाले आदरणीय सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो मुझे अत्यंत प्रिय रहा है| शायद इस गीत का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी…
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उम्र जल्वों में बसर हो–
उम्र जल्वों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं, हर शब-ए-ग़म की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं| ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी
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लौटे हैं हर इक दुकाँ से हम!
ग़म बिक रहे थे मेले में ख़ुशियों के नाम पर,मायूस होक लौटे हैं हर इक दुकाँ से हम| राजेश रेड्डी
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किसी के कमां से हम!
क्या जाने किस निशाने पे जाकर लगेंगे कब,छोड़े तो जा चुके हैं किसी के कमां से हम| राजेश रेड्डी
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नहीं हैं अपनी कहानी में हम कहीं!
मिलते नहीं हैं अपनी कहानी में हम कहीं,गायब हुए हैं जब से तेरी दास्ताँ से हम| राजेश रेड्डी