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बादल और लहरें – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया…
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आँखों ने कुछ और कह दिया!
लेकिन हमारी आँखों ने कुछ और कह दिया,कुछ और कहते रह गए अपनी ज़बाँ से हम| राजेश रेड्डी
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काम यक़ीं का गुमाँ से हम!
अब तो सराब ही से बुझाने लगे हैं प्यास,लेने लगें हैं काम यक़ीं का गुमाँ से हम| राजेश रेड्डी
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नाराज़ हैं ज़मीं से!
क्या जाने किस जहाँ में मिलेगा हमें सुकून,नाराज़ हैं ज़मीं से ख़फ़ा आसमाँ से हम| राजेश रेड्डी
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टूटे हैं कितने कहाँ से हम!
अब क्या बताएँ टूटे हैं कितने कहाँ से हम,ख़ुद को समेटते हैं यहाँ से वहाँ से हम| राजेश रेड्डी
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क्या-क्या करतब आते हैं!
काग़ज़ की कश्ती में दरिया पार किया,देखो हम को क्या-क्या करतब आते हैं| शहरयार
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तुमसे नाराज़ तो नहीं हूँ मैं!
आज मैं फिर से अपने अत्यंत प्रिय कवि एवं नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो मुझे अत्यंत प्रिय रहा है| शायद इस गीत का कुछ भाग मैंने पहले भी शेयर किया हो| यह गीत व्यक्ति के आशावाद और जीवट शक्ति को प्रबल अभिव्यक्ति देता है| परेशानियों से हार…