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मुझको क्या-क्या नहीं मिला!
हिन्दी नवगीत के प्रणेता स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद सिंह जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| इस नवगीत में उन्होंने जीवन की स्वाभाविक संपन्नताओं के साथ ही विपन्नताओं का उल्लेख किया है और आज के जीवन की जटिलताओं, संकटों की ओर भी बड़ा प्रभावी संकेत किया गया है|लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद…
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ख़याल दिल को मेरे-
गुज़र गया वो ज़माना कहूँ तो किस से कहूँ, ख़याल दिल को मेरे सुब्ह ओ शाम किसका था| दाग़ देहलवी
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ये कलाम किसका था!
वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे, तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किसका था| दाग़ देहलवी
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ये काम किसका था!
वो क़त्ल करके मुझे हर किसी से पूछते हैं, ये काम किसने किया है, ये काम किसका था| दाग़ देहलवी