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जिस दिन भी बिछड़ गया मीता!
आज एक बार फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक प्रेम गीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में भारत भूषण जी ने प्रेम की अनूठी अभिव्यक्ति की है| भावुकता का अपना सौन्दर्य है और जो लोग भावुक हैं शायद वे ही इसे समझ सकते हैं| लीजिए आज प्रस्तुत…
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अंगारे न देख!
राख़ कितनी राख़ है, चारों तरफ बिख़री हुई,राख़ में चिनगारियाँ ही देख अंगारे न देख । दुष्यंत कुमार
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दीवारों में दीवारें न देख!
ये धुन्धलका है नज़र का तू महज़ मायूस है,रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख । दुष्यंत कुमार
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उन हाथों में तलवारें न देख!
वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख । दुष्यंत कुमार
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ख़ौफ़ के मारे न देख!
अब यकीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह,यह हक़ीक़त देख लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख । दुष्यंत कुमार
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पतवारें न देख!
एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख । दुष्यंत कुमार
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आकाश के तारे न देख!
आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख । दुष्यंत कुमार
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कौन कहता है कि कविता मर गई?
धर्मवीर भारती जी की एक लंबी कविता आज शेयर कर रहा हूँ| यह कविता अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ में शामिल की गई थी| कविता लेखन के साथ ही, गंभीर रचनाकारों को हमेशा यह चिंता बनी रहती है कि विपरीत परिस्थितियों के कारण कहीं कविता मर न जाए, लेकिन परिस्थिति जैसी भी हों, कविता…