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अब घर अच्छा लगता है!
नयी-नयी आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है,कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन, अब घर अच्छा लगता है। निदा फ़ाज़ली
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पके खेत सी शादाब लगे!
घर के आंगन मैं भटकती हुई दिन भर की थकन,रात ढलते ही पके खेत सी शादाब लगे| निदा फ़ाज़ली
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खिड़की निकले कहीं मेहराब लगे!
अभी बे-साया है दीवार कहीं लोच न ख़म,कोई खिड़की कहीं निकले कहीं मेहराब लगे| निदा फ़ाज़ली
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रेशम-ओ-किम्ख्वाब लगे!
एक चुपचाप सी लड़की, न कहानी न ग़ज़ल,याद जो आये कभी रेशम-ओ-किम्ख्वाब लगे| निदा फ़ाज़ली
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कोई नया ख्वाब लगे!
कभी बादल, कभी कश्ती, कभी गर्दाब लगे,वो बदन जब भी सजे कोई नया ख्वाब लगे| निदा फ़ाज़ली
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गीत फूल-फूले!
स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत आज प्रस्तुत कर रहा हूँ| रंजक जी ने नवगीत के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई थी और कुछ अद्भुद नवगीत उन्होंने हमें दिए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत, जो गीतों की मोहकता और प्रभाव विस्तार को लेकर ही है –…