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सूरज का निकलना जारी है!
तरस रहे हैं एक सहर को जाने कितनी सदियों से,वैसे तो हर रोज़ यहाँ सूरज का निकलना जारी है| राजेश रेड्डी
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उस बात का टलना जारी है!
बरसों से जिस बात का होना, बिल्कुल तय सा लगता था,एक न एक बहाने से उस बात का टलना जारी है| राजेश रेड्डी
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पागल दिल का मचलना जारी है!
जाने कितनी बार ये टूटा, जाने कितनी बार लुटा,फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है| राजेश रेड्डी
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अपने आपको छलना जारी है!
तपती रेत पे दौड़ रहा है दरिया की उम्मीद लिए,सदियों से इन्सान का अपने आपको छलना जारी है| राजेश रेड्डी
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ये ज़िस्म बदलना जारी है!
रोज़ सवेरे दिन का निकलना, शाम में ढलना जारी है,जाने कब से रूहों का ये ज़िस्म बदलना जारी है| राजेश रेड्डी
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जीवन में अरमानों का !
आज एक बार मैं अपने जमाने में काव्य मंचों पर अपनी तरह की अलग कविता से पहचान बनाने वाले स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंग जी अक्सर कविता को आत्म कथन के रूप में, कहें कि अपनी गवाही, अपने स्वाभिमान की अभिव्यक्ति के रूप में भी प्रस्तुत करते…
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कितने शहर समंदर के हो गये!
रोते हो एक जजीरा-ए-जाँ को “फ़राज़” तुम,देखो तो कितने शहर समंदर के हो गये| अहमद फ़राज़
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कू-ए-सितमगर के हो गये!
अब के ना इंतेज़ार करें चारागर का हम,अब के गये तो कू-ए-सितमगर के हो गये| अहमद फ़राज़
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ख़ुद उसी काफिर के हो गये!
समझा रहे थे मुझ को सभी नसेहान-ए-शहर,फिर रफ्ता रफ्ता ख़ुद उसी काफिर के हो गये| अहमद फ़राज़
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हम भी तो पत्थर के हो गये!
ऐ याद-ए-यार तुझ से करें क्या शिकायतें,ऐ दर्द-ए-हिज्र हम भी तो पत्थर के हो गये| अहमद फ़राज़