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मिट्टी बोलती है!
फिर से एक बार मैं अपने एक अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी ने नवगीत के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी| बहुत से अमर नवगीतों की रचना उन्होंने की है, जिनमें आम आदमी के संघर्ष को वाणी दी गई है| लीजिए आज…
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आस का पंछी दूर उफ़क़ में डूब गया!
उड़ते-उड़ते आस का पंछी दूर उफ़क़ में डूब गया,रोते-रोते बैठ गई आवाज़ किसी सौदाई की| क़तील शिफ़ाई
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कौन सियाही घोल रहा था!
कौन सियाही घोल रहा था वक़्त के बहते दरिया में,मैंने आँख झुकी देखी है आज किसी हरजाई की| क़तील शिफ़ाई
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अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है!
अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की,तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मेरी तन्हाई की| क़तील शिफ़ाई
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गम छुपाने के लिए भी!
हो खुशी भी उनको हासिल ये ज़रूरी तो नहीं,गम छुपाने के लिए भी मुस्कुरा लेते हैं लोग| क़तील शिफ़ाई
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बिजलियाँ खुद अपने गुलशन पर!
है बजा उनकी शिकायत लेकिन इसका क्या इलाज,बिजलियाँ खुद अपने गुलशन पर गिरा लेते हैं लोग| क़तील शिफ़ाई
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नज़रें भी चुरा लेते हैं लोग!
मिल भी लेते हैं गले से अपने मतलब के लिए,आ पड़े मुश्किल तो नज़रें भी चुरा लेते हैं लोग| क़तील शिफ़ाई
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कई चेहरे सजा लेते हैं लोग!
जब भी चाहें एक नई सूरत बना लेते हैं लोग,एक चेहरे पर कई चेहरे सजा लेते हैं लोग| क़तील शिफ़ाई
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जा तुझको भी नींद न आए!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के एक महान गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| भारत भूषण जी के गीत पढ़ना और उससे भी अधिक जो सौभाग्य मुझे अनेक बार मिला, उनको गीत पाठ करते हुए सुनना एक दिव्य अनुभव होता था| उनके बहुत से गीत अमर हैं,…