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ख़त तो नहीं है कि जला भी न सकूँ!
फूँक डालूँगा किसी रोज़ मैं दिल की दुनिया, ये तिरा ख़त तो नहीं है कि जला भी न सकूँ| राहत इन्दौरी
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ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ!
अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ, ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ| राहत इन्दौरी
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हम न होंगे!
आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध आधुनिक हिन्दी कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक और सुंदर कविता शेयर कर रहा हूँ| अशोक वाजपेयी जी की कुछ कविताएं मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ और उनके बारे में अपनी जानकारी भी शेयर कर चुका हूँ|लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की एक…
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क़लंदर हो गदा हो नहीं सकता!
दरबार में जाना मिरा दुश्वार बहुत है, जो शख़्स क़लंदर हो गदा हो नहीं सकता| मुनव्वर राना
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बाद-ए-सबा हो नहीं सकता!
इस ख़ाक-ए-बदन को कभी पहुँचा दे वहाँ भी, क्या इतना करम बाद-ए-सबा हो नहीं सकता| मुनव्वर राना
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मुझे तूने मुसीबत से निकाला!
ऐ मौत मुझे तूने मुसीबत से निकाला, सय्याद समझता था रिहा हो नहीं सकता| मुनव्वर राना
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इस शहर में क्या हो नहीं सकता!
बस तू मिरी आवाज़ से आवाज़ मिला दे, फिर देख कि इस शहर में क्या हो नहीं सकता| मुनव्वर राना
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इतना तो दिया हो नहीं सकता!
दहलीज़ पे रख दी हैं किसी शख़्स ने आँखें, रौशन कभी इतना तो दिया हो नहीं सकता| मुनव्वर राना
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ज़ियादा मैं तिरा हो नहीं सकता!
मिट्टी में मिला दे कि जुदा हो नहीं सकता, अब इससे ज़ियादा मैं तिरा हो नहीं सकता| मुनव्वर राना