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तेरे शहर के लोग!
आज मोहसिन नक़वी जी की लिखी एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| इस ग़ज़ल को जगजीत सिंह जी ने गाया था| कई बार यही खयाल आता है कि श्री जगजीत सिंह जी जैसे लोकप्रिय गायक यदि नहीं होते तो इन महान शायरों की शायरी हम सब तक कैसे पहुँच पाती? एक प्रसंग याद या रहा…
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ये दुनिया सौ रंग दिखाती है!
हर रंग में ये दुनिया सौ रंग दिखाती है,रोकर कभी हंसती है हंसकर कभी गाती है,ये प्यार की बाहें हैं या मौत की अंगडाई| अली सरदार जाफ़री
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आंखों से लहू टपका !
आकाश के माथे पर तारों का चरागाँ है,पहलू में मगर मेरे जख्मों का गुलिस्तां,आंखों से लहू टपका दामन में बहार आई| अली सरदार जाफ़री
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रोती है मेरे दिल पर!
अरमान सुलगते हैं सीने में चिता जैसे,कातिल नज़र आती है दुनिया की हवा जैसे,रोती है मेरे दिल पर बजती हुई शहनाई| अली सरदार जाफ़री
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राही भी तमाशाई!
ये फूल से चहरे हैं हँसते हुए गुलदस्ते,कोई भी नहीं अपना बेगाने हैं सब रस्ते,राहें हैं तमाशाई राही भी तमाशाई| अली सरदार जाफ़री
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हर मोड़ पे रुसवाई!
आवारा हैं गलियों में मैं और मेरी तनहाई,जाएँ तो कहाँ जाएँ हर मोड़ पे रुसवाई| अली सरदार जाफ़री
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मेरी पराश्रितता – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। लीजिए पहले…