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मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ!
हिन्दी काव्य मंचों पर अपने समय के एक लोकप्रिय कवि स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| नेपाली जी का यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था- बदनाम रहे बटमार मगर, घर तो रखवालों ने लूटा,मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा| इसके अलावा फिल्मों के लिए लिखे…
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ये डगर कुछ और ही है!
आपके रस्ते हैं आसाँ आपकी मंजिल क़रीब,ये डगर कुछ और ही है जिस डगर जाता हूँ मैं| राजेश रेड्डी
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क्यूँ बिखर जाता हूँ मैं!
ज़िन्दगी जब मुझसे मज़बूती की रखती है उमीद,फ़ैसले की उस घड़ी में क्यूँ बिखर जाता हूँ मैं| राजेश रेड्डी
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अपने ही साये से भी डर जाता हूँ मैं!
सारी दुनिया से अकेले जूझ लेता हूँ कभी,और कभी अपने ही साये से भी डर जाता हूँ मैं| राजेश रेड्डी
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फिर भी उधर जाता हूँ मैं!
जानता हूँ रेत पर वो चिलचिलाती धूप है,जाने किस उम्मीद में फिर भी उधर जाता हूँ मैं| राजेश रेड्डी
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और मर जाता हूँ मैं!
शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं,मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं| राजेश रेड्डी